महारानी लक्ष्मी बाई का जन्म 18 नवंबर 1928 ई को हुआ था। इनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था और इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे था तथा माता का नाम भागीरथी सापरे था। ये बचपन से वीर कौशल की थी, इन्होंने पुरुष की तरह युद्ध की शिक्षा ली। बाजीराव द्वितीय के दरबार के योद्धा श्री तात्या टोपे इनके गुरु रहे। 12 वर्ष की आयु में इनका विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव नेवालकर से हुआ तभी यें झांसी की रानी बनी और इनका नाम महारानी लक्ष्मीबाई पड़ा। इनके एक पुत्र हुआ परंतु साजिशों के बने महल में उसकी बचपन में ही मृत्यु हो गई। झांसी का सिंहासन भविष्य में खाली न रहे इसके लिए उन्होंने दत्तक पुत्र लिया जिसका नाम दामोदर राव था। 1853 ई में राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई।
महाराजा के बाद रानी लक्ष्मी बाई झांसी की गद्दी पर बैठी और उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ़ युद्ध की घोषणा कर दी उन्होंने अंग्रेजी सैनिकों को धूल चटा दी थी। युद्ध में लड़ते हुए 1858 ई में गोली और तलवार लगने से वीरगति को प्राप्त हो गई।
महारानी लक्ष्मी बाई की विचारधारा -
रानी लक्ष्मीबाई कहती थी कि हम स्वतंत्र हैं और इन अंग्रेजो के खिलाफ हमें मिलकर लड़ना होगा। उन्हें अंग्रेजी नीति बिल्कुल भी पसंद नहीं थी।
हालाकिं वें अंग्रेजो के खिलाफ नहीं थी बल्कि अंग्रेजों की घृणित मानसिकता के खिलाफ थी।
उन्होंने नारी शक्ति को बढ़ावा दिया इसके लिए एक नारी सेना का गठन भी किया।
उनके यह उच्च विचार और उनकी वीरता ही आज उन्हें महान बनाती है। ऐसी वीरांगना को शत् शत् नमन।
कबीरदास जी गुरु नानक जी सूरदास जी महारानी लक्ष्मी बाई एकलव्य रविदास


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