नवरात्रि व्रत कथा, महिषासुर वध की पौराणिक कथा, पूजा विधि, 9 देवी स्वरूप और उपवास नियम सहित सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करें। Navratri Vrat Katha in Hindi

नवरात्रि व्रत कथा, महिषासुर वध की पौराणिक कथा, पूजा विधि, 9 देवी स्वरूप और उपवास नियम सहित सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करें।

माँ शेरोवाली का चित्र नवरात्रि व्रत के लिए

🌺 नवरात्रि व्रत कथा: एक पावन गाथा

नवरात्रि हिन्दू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली पर्व है, जिसमें माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। यह व्रत 9 दिनों तक चलता है और भक्त उपवास, पूजा और भजन के माध्यम से माता रानी की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।


📜 नवरात्रि व्रत कथा की पौराणिक पृष्ठभूमि

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि व्रत की कथा मुख्यतः महिषासुर मर्दिनी माता दुर्गा के अद्भुत पराक्रम और शक्ति को समर्पित है।

🧿 महिषासुर का आतंक

महिषासुर एक अत्यंत बलशाली असुर था जिसे ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि कोई देवता या पुरुष उसे नहीं मार सकता। इस वरदान के कारण उसने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर देवताओं को पराजित कर दिया।

🌸 दुर्गा माता का प्राकट्य

देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश से सहायता मांगी। तीनों देवताओं की शक्ति से एक दिव्य स्त्री उत्पन्न हुई — मां दुर्गा। उनके दसों हाथों में विभिन्न देवताओं के अस्त्र-शस्त्र थे।

⚔️ 9 दिन का युद्ध

मां दुर्गा और महिषासुर के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जो नौ दिनों तक चला। दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। यही दिन विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है।


🙏 नवरात्रि व्रत का महत्व

  • आत्म-शुद्धि और आत्मबल की प्राप्ति

  • देवी शक्ति की आराधना द्वारा नकारात्मक शक्तियों का विनाश

  • मनोकामनाओं की पूर्ति

  • जीवन में सुख, शांति और समृद्धि


🍽️ व्रत विधि (Navratri Vrat Vidhi)

  1. कलश स्थापना: पहले दिन घट स्थापना की जाती है।

  2. जागरण और दुर्गा पाठ: हर दिन माता के एक रूप की पूजा।

  3. उपवास और सात्विक भोजन: भक्त फलाहार या केवल एक समय भोजन करते हैं।

  4. कन्या पूजन (अष्टमी/नवमी को): 9 कन्याओं को देवी का रूप मानकर भोजन कराना।


🌼 नवरात्रि के नौ देवी स्वरूप (Navdurga)

दिन देवी स्वरूप विशेषता
1️⃣ शैलपुत्री पर्वतराज की पुत्री
2️⃣ ब्रह्मचारिणी तपस्विनी रूप
3️⃣ चंद्रघंटा सौंदर्य व शक्ति का प्रतीक
4️⃣ कूष्मांडा ब्रह्मांड की सृष्टिकर्ता
5️⃣ स्कंदमाता कार्तिकेय की माता
6️⃣ कात्यायनी वीरता की प्रतीक
7️⃣ कालरात्रि अंधकार नाशक
8️⃣ महागौरी शांति व करुणा की देवी
9️⃣ सिद्धिदात्री सभी सिद्धियों की दात्री

🌟 नवरात्रि का संदेश

नवरात्रि हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति, श्रद्धा और संयम के साथ किया गया तप हर बाधा को दूर कर सकता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

👉व्रत की विधि

प्रात: नित्यकर्म से निवृत हो, स्नान कर, मंदिर में या घर पर ही नवरात्र में दुर्गा जी का ध्यान करके यह कथा करनी चाहिए। कन्याओं के लिए यह व्रत विशेष लाभदायक है। श्री जगदम्बा की कृपा से सब विध्न दूर हो जाते हैं तथा सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है।

🙏 प्रार्थना

हे परमेश्वरी! मेरे द्वारा रात दिन सहस्त्रों अपराध होत हैं 'यह मेरा दास है' समझ कर मेरे अपराधों को क्षमा करो। हे परमेश्वरी! मैं आह्वान, विसर्जन और पूजन करना नहीं जानता, मुझे क्षमा करो। हे सुरेश्वरी! मैंने जो मंत्रहीन, क्रियाहीन, भक्तयुक्त पूजन किया है वह स्वीकार करो। हे परमेश्वरी! अज्ञान से, भूल से अथवा बुद्धि भ्रान्ति से जो न्यूनता अथवा अधिकता हो गई है उसे क्षमा करिये तथा प्रसन्न होईये।


🕉️ शुभकामनाएँ

🌸 “या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥” 🌸

🙏 आप और आपके परिवार को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏
✨ जय माता दी ✨

🌸1. मां शैलपुत्री की कथा और महत्व 🌸

🙏 परिचय

नवरात्रि के प्रथम दिन मां दुर्गा की पूजा शैलपुत्री के रूप में की जाती है।

  • "शैल" का अर्थ है पर्वत और "पुत्री" का अर्थ है बेटी।

  • हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लेने के कारण उनका नाम शैलपुत्री पड़ा।

  • इन्हें वृषारूढ़ा (बैल पर सवार) भी कहा जाता है।


🗡️ स्वरूप

  • वाहन: वृषभ (बैल)

  • दायां हाथ: त्रिशूल

  • बायां हाथ: कमल

  • श्वेत वस्त्रों में सुसज्जित, मस्तक पर चंद्रमा से शोभायमान।


📖 कथा

मां शैलपुत्री वही सती हैं जिन्होंने पिछले जन्म में प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव का अपमान सहन न कर योगाग्नि द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया था।

  • दक्ष ने अपने यज्ञ में सभी देवताओं को आमंत्रित किया लेकिन भगवान शिव को नहीं बुलाया।

  • सती ने वहां जाने का आग्रह किया, शिवजी ने मना किया लेकिन उनके अनुरोध पर अनुमति दे दी।

  • यज्ञ स्थल पर मां ने ही स्नेह दिया, परंतु बहनों ने उपहास किया और दक्ष ने शिवजी का अपमान किया।

  • यह असहनीय अपमान देखकर सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए।

  • इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने यज्ञ का विध्वंस करा दिया।

इसके बाद सती ने हिमालयराज के घर जन्म लिया और शैलपुत्री के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
इन्हीं को पार्वती और हेमवती भी कहा जाता है। बाद में इनका विवाह पुनः भगवान शिव से हुआ।


✨ महत्व

  • मां शैलपुत्री की पूजा नवरात्रि के प्रथम दिन होती है।

  • इनकी आराधना से जातक को स्थिरता, संयम और भक्ति की प्राप्ति होती है।

  • धार्मिक मान्यता है कि मां शैलपुत्री की पूजा से कुंडली का चंद्र दोष दूर होता है और जीवन में शांति आती है।


🕉️ मंत्र और अर्थ

मंत्र

"ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥"

अर्थ

हे पर्वतराज की पुत्री मां शैलपुत्री!
आपको प्रणाम है। कृपया मुझे जीवन में शक्ति, भक्ति और स्थिरता प्रदान करें।

🌼2. मां ब्रह्मचारिणी की कथा और महत्व 🌼


🙏 परिचय

नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा की जाती है।

  • "ब्रह्म" का अर्थ है तपस्या और "चारिणी" का अर्थ है आचरण करने वाली।

  • कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी तथा अपर्णा नाम से भी जाना जाता है।


📖 कथा

पूर्वजन्म में जब देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया, तब नारदजी के उपदेश से उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प किया।

  • इन्होंने हजार वर्षों तक केवल फल-फूल खाए।

  • फिर सौ वर्षों तक केवल शाक पर निर्वाह किया और कठोर तपस्या करती रहीं।

  • कुछ समय तक खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप का कष्ट सहते हुए उपवास रखा।

  • तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बेलपत्र खाकर भगवान शिव की आराधना की।

  • इसके बाद उन्होंने सूखे बेलपत्र खाना भी त्याग दिया।

  • अंततः कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रहकर तपस्या की।

  • पत्तों का त्याग करने के कारण उन्हें अपर्णा नाम मिला।

उनकी तपस्या से समस्त देवता, ऋषि, मुनि और सिद्धगण प्रभावित हो गए और उनकी अद्भुत शक्ति की सराहना की।
अंततः भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।


🗡️ स्वरूप

  • वाहन: कमल और माला लिए हुए स्वरूप

  • दायां हाथ: जप की माला

  • बायां हाथ: कमंडलु (जल पात्र)

  • यह रूप शांत और तेजस्वी है, जो तप और भक्ति का प्रतीक है।


✨ महत्व

  • मां ब्रह्मचारिणी की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन होती है।

  • इनके पूजन से तप, संयम और आत्मबल की प्राप्ति होती है।

  • धार्मिक मान्यता है कि इनकी कृपा से मंगल दोष का प्रभाव कम होता है और विवाह संबंधी बाधाएँ दूर होती हैं।

  • मां का यह स्वरूप जीवन के कठिन संघर्षों में धैर्य और संकल्प शक्ति प्रदान करता है।


🕉️ मंत्र और अर्थ

मंत्र

"ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥"

अर्थ

हे तपस्विनी मां ब्रह्मचारिणी!
आपको प्रणाम है। आपकी कृपा से भक्त को तप, आत्मबल और सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

🌙🔔3. मां चंद्रघंटा की कथा और महत्व 🔔🌙

🙏 परिचय

नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा की चंद्रघंटा स्वरूप में पूजा की जाती है।

  • इनके मस्तक पर अर्धचंद्र के आकार की स्वर्णिम घंटा सुशोभित है।

  • इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है।

  • इनका रूप सौंदर्य, शांति और शक्ति का अद्भुत संगम है।


📖 कथा

देवताओं और असुरों के बीच लंबे समय तक युद्ध चलता रहा।

  • असुरों का स्वामी महिषासुर था, जिसने देवताओं को पराजित कर स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया।

  • देवता निराश होकर त्रिदेव — ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुँचे।

  • देवताओं की व्यथा सुनकर त्रिदेव के क्रोध से प्रचंड ऊर्जा उत्पन्न हुई, जो देवताओं की शक्ति से मिलकर एकत्र हुई।

  • उसी ऊर्जा से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं।

देवताओं ने उन्हें अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए:

  • भगवान शंकर ने त्रिशूल

  • भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र

  • इंद्र ने अपना वज्र और ऐरावत से घंटा

  • सूर्य ने तेज और तलवार

  • सवारी के लिए उन्हें सिंह (शेर) मिला।

मां चंद्रघंटा ने महिषासुर और उसकी असुर सेना से भयंकर युद्ध किया।

  • उन्होंने दानवों का संहार कर दिया।

  • महिषासुर का वध कर स्वर्गलोक देवताओं को वापस दिला दिया।

  • इस प्रकार देवताओं को भयमुक्त कर अभयदान प्रदान किया।


🗡️ स्वरूप

  • वाहन: सिंह (शेर)

  • हाथ: दस भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र

  • मस्तक पर: अर्धचंद्र आकार की स्वर्णिम घंटा

  • रूप: तेजस्वी, वीर और करुणामयी


✨ महत्व

  • मां चंद्रघंटा की पूजा नवरात्रि के तीसरे दिन होती है।

  • इनकी उपासना से भय, रोग और शत्रु का नाश होता है।

  • धार्मिक मान्यता है कि मां चंद्रघंटा की पूजा से जातक की जन्मपत्री का शुक्र दोष समाप्त होता है।

  • इनकी कृपा से घर-परिवार में शांति और सुख-समृद्धि आती है।


🕉️ मंत्र और अर्थ

मंत्र

"ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः॥"

अर्थ

हे माता चंद्रघंटा!
आपको प्रणाम है। आपके आशीर्वाद से भक्त निर्भय होता है, जीवन से सभी विघ्न-बाधाएँ दूर होती हैं और सुख-शांति प्राप्त होती है।

🌞4. माँ कूष्मांडा की कथा और महिमा 🌞

🙏परिचय

नवरात्रि के चौथे दिन माँ दुर्गा के कूष्मांडा स्वरूप की पूजा होती है।
"कूष्मांड" शब्द का अर्थ है — कु (थोड़ा), उष्मा (ऊर्जा/ताप), अंड (ब्रह्मांड)।
अर्थात् माँ कूष्मांडा वह देवी हैं जिन्होंने अपनी हल्की सी मुस्कान से पूरे ब्रह्मांड की रचना कर दी।
इन्हें सृष्टि की आदिस्वरूपा और आदिशक्ति कहा जाता है।

📖 कथा

जब सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं था, चारों ओर केवल अंधकार ही अंधकार था, तब माँ कूष्मांडा ने अपने हल्के से ईषत् हास्य (मुस्कान) से सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना की। इसलिए इन्हें सृष्टि की आदिस्वरूपा और आदिशक्ति कहा जाता है।

इन्हीं के प्रकाश और ऊर्जा से

  • सूर्य मंडल और अन्य ग्रह-नक्षत्र प्रकाशित हुए,

  • जीवन और ऊर्जा का संचार हुआ।

इनका वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में माना गया है। यह सामर्थ्य केवल इन्हीं में है, इसलिए इन्हें ही सूर्य की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है।

✨ माँ कूष्मांडा की महिमा

  • इनके शरीर की आभा सूर्य के समान दैदीप्यमान है।

  • इनकी उपासना से भक्त को आयु, यश, बल, आरोग्य और समृद्धि प्राप्त होती है।

  • ये थोड़ी-सी पूजा और भक्ति से ही प्रसन्न होकर भक्त की मनोकामना पूर्ण कर देती हैं।

  • माँ की कृपा से भक्त आधि-व्याधि से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।

  • जिनकी कुंडली में सूर्य दोष, उन्हें माँ की आराधना से विशेष लाभ मिलता है।


🙏 पूजा का महत्व

नवरात्रि के चौथे दिन माँ कूष्मांडा की पूजा अर्चना की जाती है।
सच्चे मन से आराधना करने वाले भक्त के

  • शोक और रोग नष्ट होते हैं,

  • जीवन में उन्नति और सुख-समृद्धि आती है।


🕉️ माँ कूष्मांडा का मंत्र

"ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥"


📜 मंत्र का अर्थ

"हे माँ कूष्मांडा, ब्रह्मांड की सृष्टिकर्ता और सूर्य के तेज से प्रकाशित देवी! मैं आपको नमन करता हूँ। आप मेरे जीवन से अंधकार हटाकर सुख-समृद्धि प्रदान करें।"

🌸5. माँ स्कंदमाता की कथा और महिमा 🌸

🙏परिचय

नवरात्रि के पाँचवे दिन माँ दुर्गा के स्कंदमाता स्वरूप की पूजा होती है।

  • इनका यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि ये कुमार कार्तिकेय (स्कंद) की माता हैं।

  • इनके विग्रह में भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजित रहते हैं।

  • इनकी चार भुजाएँ हैं —

    • दाईं ऊपरी भुजा में स्कंद को गोद में धारण किए,

    • दाईं निचली भुजा में कमल पुष्प,

    • बाईं ऊपरी भुजा वरद मुद्रा में,

    • बाईं निचली भुजा में कमल पुष्प।

  • इनका वर्ण अत्यंत शुभ्र (सफेद) है और ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं, इसलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है।

  • इनका वाहन सिंह है।


📖 माँ स्कंदमाता की कथा

जब कुमार कार्तिकेय की रक्षा हेतु माता पार्वती ने आदिशक्ति स्वरूप धारण किया तो इंद्र और देवता भयभीत हो गए।
इंद्र ने देवी से क्षमा याचना की और उनके शांत स्वरूप को पाने के लिए स्तुति की।
चूँकि कार्तिकेय का एक नाम स्कंद भी है, इसलिए देवी को स्कंदमाता कहकर पुकारा गया।
तब से देवी अपने पाँचवे स्वरूप में स्कंदमाता नाम से जानी जाती हैं और नवरात्रि के पाँचवे दिन उनकी पूजा का विधान है।


✨ माँ स्कंदमाता की महिमा

  • इनकी उपासना से भक्त की सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।

  • माँ की कृपा से भक्त को मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सरल हो जाता है।

  • ये सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए साधक को अलौकिक तेज और कांति प्रदान करती हैं।

  • इनकी पूजा से भक्त का मन एकाग्र और पवित्र होता है।

  • विद्वता और रचनात्मकता का वरदान भी इनकी कृपा से प्राप्त होता है — कहा जाता है कि महाकवि कालिदास ने रघुवंश और मेघदूत जैसे ग्रंथ माँ स्कंदमाता की कृपा से रचे।


🙏 पूजा का महत्व

नवरात्रि के पाँचवे दिन माँ स्कंदमाता की पूजा करने से

  • बुध ग्रह की स्थिति मजबूत होती है।

  • साधक को विद्या, बुद्धि, धर्म और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

  • भक्त को सांसारिक सुखों के साथ-साथ परम शांति का वरदान मिलता है।


🕉️ माँ स्कंदमाता का मंत्र

"ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥"


📜 मंत्र का अर्थ

"हे माँ स्कंदमाता, कुमार कार्तिकेय की जननी और पद्मासना देवी! आपको नमन है। आप मेरे जीवन में सुख, बुद्धि, ज्ञान और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करें।"

🪔6. माँ कात्यायनी की कथा और महिमा 🪔

🙏परिचय

नवरात्रि के छठे दिन माँ दुर्गा के कात्यायनी स्वरूप की पूजा होती है।

  • इनकी चार भुजाएँ हैं —

    • दाहिने हाथ में ऊपर अभय मुद्रा,

    • दाहिने नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में,

    • बाएँ ऊपर वाले हाथ में तलवार,

    • बाएँ नीचे वाले हाथ में कमल पुष्प

  • इनका वाहन सिंह है।

  • इनका स्वरूप अत्यंत भव्य, स्वर्ण के समान चमकीला और तेजस्वी है।

  • ये देवी शत्रुहंता कही जाती हैं और अत्यंत दिव्य स्वरूप से भक्तों का कल्याण करती हैं।


📖 माँ कात्यायनी की कथा

प्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि देवी स्वयं उनकी पुत्री बनकर जन्म लें।
भगवती उनकी तपस्या से प्रसन्न हुईं और उनके घर पुत्री के रूप में अवतरित हुईं, इसलिए इनका नाम पड़ा कात्यायनी

माँ कात्यायनी के विषय में मान्यता है —

  • ये वैद्यनाथ धाम में प्रकट होकर पूजी गईं।

  • ब्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए यमुना तट पर माँ कात्यायनी की पूजा की थी।

  • इसीलिए इन्हें ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी भी कहा जाता है।


✨ माँ कात्यायनी की महिमा

  • माँ कात्यायनी शोध और अनुसंधान की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए वैज्ञानिक युग में इनका विशेष महत्व है।

  • इनकी कृपा से सभी कार्य सफल होते हैं।

  • जो कन्याएँ विवाह योग्य होती हैं और उनके विवाह में बाधाएँ आती हैं, वे यदि माँ कात्यायनी की पूजा करें तो उनका विवाह शीघ्र होता है।

  • ये शत्रुहंता देवी हैं, इसलिए भक्त को शत्रुओं से मुक्ति और जीवन में विजय प्राप्त होती है।

  • साधक को माँ की आराधना से असीम आशीर्वाद, साहस और शांति प्राप्त होती है।


🙏 पूजा का महत्व

  • नवरात्रि के छठे दिन भक्त को अपना मन आग्नेय चक्र (मणिपुर चक्र) पर केंद्रित करना चाहिए।

  • माँ कात्यायनी की आराधना करने से बृहस्पति ग्रह से संबंधित दोष दूर होते हैं।

  • माँ को पूर्ण समर्पण भाव से पूजा करने वाला साधक माँ का असीम आशीर्वाद प्राप्त करता है।


🕉️ माँ कात्यायनी का मंत्र

"ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥"


📜 मंत्र का अर्थ

"हे देवी कात्यायनी, महर्षि कात्यायन की पुत्री और शत्रुओं का नाश करने वाली माता! आपको नमन है। कृपया मेरे जीवन से सभी विघ्न, शत्रु और दोषों का नाश कर सुख और समृद्धि प्रदान करें।"

🌑7. माँ कालरात्रि की कथा और महिमा 🌑

🙏परिचय

नवरात्रि के सातवें दिन माँ दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा होती है।

  • इनके तीन नेत्र हैं, जो ब्रह्मांड के समान विशाल और गोल हैं।

  • इनकी साँसों से अग्नि की ज्वालाएँ निकलती रहती हैं।

  • इनका वाहन गर्दभ (गधा) है।

  • इनकी मुद्रा —

    • दाहिने ऊपर का हाथ वर मुद्रा में,

    • दाहिने नीचे का हाथ अभय मुद्रा में,

    • बाएँ ऊपर का हाथ लोहे का कांटा (वज्र) लिए,

    • बाएँ नीचे का हाथ खड्ग (तलवार) लिए हुए।

  • इनका शरीर अत्यंत काला है, सिर पर बिखरे हुए बाल और गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है।

  • इनका रूप भयंकर है, परंतु ये सदैव भक्तों को शुभ फल देने वाली हैं।


📖 माँ कालरात्रि की कथा

जब दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में आतंक मचाया, तो देवताओं ने शिवजी से रक्षा की प्रार्थना की।
शिवजी के कहने पर पार्वती जी ने दुर्गा रूप धारण कर शुंभ और निशुंभ का वध किया।

लेकिन समस्या रक्तबीज को मारने पर आई।

  • रक्तबीज की शक्ति यह थी कि उसके शरीर से गिरे रक्त की हर बूंद से एक नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाता था।

  • इसे देख देवी दुर्गा ने अपने तेज से कालरात्रि को प्रकट किया

  • जब दुर्गा ने रक्तबीज का वध किया, तो उसके रक्त को कालरात्रि ने अपने मुख में भर लिया, जिससे कोई नया रक्तबीज उत्पन्न नहीं हो सका।

  • अंततः कालरात्रि ने सबका संहार कर दिया और रक्तबीज का वध हुआ।

इस प्रकार माँ कालरात्रि ने देवताओं और तीनों लोकों को आतंक से मुक्त कराया।


✨ माँ कालरात्रि की महिमा

  • इनका रूप भले ही भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल देने वाली (शुभंकरी) हैं।

  • इनकी उपासना करने से साधक को निर्भयता, साहस और शक्ति प्राप्त होती है।

  • इनके स्मरण मात्र से ही दानव, राक्षस, भूत-प्रेत और दुष्ट शक्तियाँ भाग जाती हैं।

  • ये अंधकार और भय का नाश करने वाली शक्ति हैं।

  • इनकी कृपा से साधक को सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं और जीवन में आने वाली बाधाएँ नष्ट होती हैं।

  • अग्नि, जल, शत्रु, रात्रि भय और ग्रह बाधाएँ सब इनकी पूजा से दूर हो जाती हैं।

  • कालरात्रि साधक को काल (मृत्यु) के भय से भी मुक्ति देती हैं।


🙏 पूजा का महत्व

  • नवरात्रि के सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है।

  • इनकी पूजा करने से शनि ग्रह से संबंधित दोष समाप्त होते हैं।

  • भक्त हर प्रकार के भय से मुक्त होकर आत्मिक शांति और अद्भुत शक्ति प्राप्त करता है।


🕉️ माँ कालरात्रि का मंत्र

"ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥"


📜 मंत्र का अर्थ

"हे देवी कालरात्रि, अंधकार और भय का नाश करने वाली, शुभ फल प्रदान करने वाली माता! आपको मेरा नमन है। कृपया मेरे जीवन से सभी भय और बाधाओं को दूर करें और मुझे निर्भय बनाएं।"

🙏✨8. माँ महागौरी की कथा और महिमा 🙏✨

🙏परिचय

माँ महागौरी नवरात्रि की आठवीं देवी हैं। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है, इसलिए इन्हें अष्टवर्षा भवेद् गौरी कहा जाता है। इनका स्वरूप अत्यंत शांत और दिव्य है। इनकी चार भुजाएँ हैं।

  • ऊपर का दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है।

  • नीचे का दाहिना हाथ त्रिशूल धारण किए हुए है।

  • ऊपर का बायाँ हाथ डमरू से सुशोभित है।

  • नीचे का बायाँ हाथ वर मुद्रा में है।

माँ का वाहन वृषभ (बैल) है, इसलिए इन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है। इनका वेश-भूषा और आभूषण श्वेत (सफेद) रंग के होते हैं, इसलिए इन्हें श्वेताम्बरधरा भी कहा जाता है।


📖माँ महागौरी की कथा

कथा के अनुसार, भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माँ महागौरी ने कठोर तप किया। तपस्या के कारण उनका शरीर काला पड़ गया। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गंगा जी के पवित्र जल से उनका स्नान कराया। गंगा जल के स्पर्श से उनका शरीर गौर वर्ण का हो गया और वे दिव्य, कांतिमय हो उठीं। तभी से वे महागौरी के नाम से विख्यात हुईं।

माँ महागौरी को अमोघ फलदायिनी कहा गया है। इनकी कृपा से भक्त के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, जीवन के कल्मष धुल जाते हैं और अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।


🙏माँ महागौरी की महत्ता

  • नवरात्रि के आठवें दिन माँ महागौरी की पूजा का विशेष महत्व है।

  • इनकी उपासना से राहु ग्रह के दोष समाप्त होते हैं।

  • भक्त को शांति, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।


🕉️ माँ महागौरी का मंत्र

➡️ "ॐ देवी महागौर्यै नमः।"

📜 मंत्र का अर्थ:

हे महागौरी देवी! आपको नमन है। आप श्वेतवस्त्रधारिणी, शांति स्वरूपा और पवित्रता की प्रतिमूर्ति हैं। आपकी उपासना से भक्तों का जीवन निर्मल, पापमुक्त और कल्याणकारी हो जाता है।

🌺9. माँ सिद्धिदात्री की कथा और महिमा 🌺

🙏परिचय

माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति सिद्धिदात्री कहलाती हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ (आध्यात्मिक और अलौकिक शक्तियाँ) प्रदान करने वाली देवी हैं। इनके चार भुजाएँ हैं, जिनमें से

  • दाहिने हाथ में कमल पुष्प

  • एक हाथ में अभय मुद्रा

  • अन्य हाथों में चक्र और गदा सुशोभित रहते हैं।

इनका वाहन सिंह है, साथ ही ये कमल पुष्प पर आसीन भी होती हैं। इनका स्वरूप अत्यंत शांत, भव्य और करुणामयी है।


📖 कथा

मार्कण्डेय पुराण और देवीपुराण के अनुसार, देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना सुनकर माँ भगवती ने सिद्धिदात्री स्वरूप धारण किया। वे ही देवी हैं जिन्होंने भगवान शिव को आठों सिद्धियाँ प्रदान कीं। इन्हीं की अनुकम्पा से भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ, और वे अर्द्धनारीश्वर कहलाए।

सिद्धिदात्री देवी साधकों को अष्टसिद्धियाँ प्रदान करती हैं:

  1. अणिमा – सूक्ष्मतम रूप धारण करने की शक्ति।

  2. महिमा – विराट रूप धारण करने की शक्ति।

  3. गरिमा – भारी से भारी बनने की शक्ति।

  4. लघिमा – हल्का से हल्का बनने की शक्ति।

  5. प्राप्ति – इच्छित वस्तु की प्राप्ति की शक्ति।

  6. प्राकाम्य – इच्छित स्थान पर जाने की शक्ति।

  7. ईशित्व – सम्पूर्ण सृष्टि पर नियंत्रण की शक्ति।

  8. वशित्व – सभी प्राणियों को वश में करने की शक्ति।

ब्रह्मवैवर्तपुराण में इनकी संख्या 18 सिद्धियाँ बताई गई हैं,

जिनमें- 1. अणिमा 2. लघिमा 3. प्राप्ति 4. प्राकाम्य 5. महिमा 6. ईशित्व,वाशित्व 7. सर्वकामावसायिता 8. सर्वज्ञत्व 9. दूरश्रवण 10. परकायप्रवेशन 11. वाक्‌सिद्धि 12. कल्पवृक्षत्व 13. सृष्टि 14. संहारकरणसामर्थ्य 15. अमरत्व 16. सर्वन्यायकत्व 17. भावना 18. सिद्धि, करने की सामर्थ्य आदि अद्भुत शक्तियाँ सम्मिलित हैं।


 महिमा

  • माँ सिद्धिदात्री की पूजा करने वाला भक्त सभी सांसारिक और पारलौकिक इच्छाओं से ऊपर उठकर मोक्ष को प्राप्त करता है।

  • इनकी कृपा से भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष नहीं रहती जो अधूरी हो।

  • ये साधक को ब्रह्मांडीय शक्ति से जोड़ देती हैं, जिससे वह विषयरहित होकर दिव्यता में स्थित होता है।


🙏 पूजा

नवरात्रि की नवमी तिथि को माँ सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है।

  • इस दिन विशेष रूप से शास्त्रीय विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए।

  • साधक को पूर्ण निष्ठा और भक्ति भाव से देवी का ध्यान करना चाहिए।

  • इस पूजा से केतु ग्रह से संबंधित दोष समाप्त हो जाते हैं।

  • साधना में रुद्राक्ष, कमल या चंदन की माला से मंत्र जप करना शुभ माना गया है।


🕉️ मंत्र एवं स्तुति

🔹 मूल मंत्र
➡️ "ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।"

🔹 स्तोत्र मंत्र
➡️ "या देवी सर्वभू‍तेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।"

अर्थ:
हे माँ! आप समस्त प्राणियों में सिद्धिदात्री रूप से विद्यमान हैं। आपको बारंबार नमन है। हे माँ, कृपाकर हमें अपने अनुग्रह का पात्र बनाइए।


सार

माँ सिद्धिदात्री की उपासना से साधक को सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। वे सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर दिव्य लोकों में विचरण करता है और अंततः मोक्ष को प्राप्त करता है। नवरात्रि की नवमी को इनकी पूजा करने से जीवन से सभी दुख, दोष और बाधाएँ दूर होती हैं।





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