🙏✨8. माँ महागौरी की कथा और महिमा 🙏✨
🙏परिचय
माँ महागौरी नवरात्रि की आठवीं देवी हैं। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है, इसलिए इन्हें अष्टवर्षा भवेद् गौरी कहा जाता है। इनका स्वरूप अत्यंत शांत और दिव्य है। इनकी चार भुजाएँ हैं।
ऊपर का दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है।
नीचे का दाहिना हाथ त्रिशूल धारण किए हुए है।
ऊपर का बायाँ हाथ डमरू से सुशोभित है।
नीचे का बायाँ हाथ वर मुद्रा में है।
माँ का वाहन वृषभ (बैल) है, इसलिए इन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है। इनका वेश-भूषा और आभूषण श्वेत (सफेद) रंग के होते हैं, इसलिए इन्हें श्वेताम्बरधरा भी कहा जाता है।
📖माँ महागौरी की कथा
कथा के अनुसार, भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माँ महागौरी ने कठोर तप किया। तपस्या के कारण उनका शरीर काला पड़ गया। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गंगा जी के पवित्र जल से उनका स्नान कराया। गंगा जल के स्पर्श से उनका शरीर गौर वर्ण का हो गया और वे दिव्य, कांतिमय हो उठीं। तभी से वे महागौरी के नाम से विख्यात हुईं।माँ महागौरी को अमोघ फलदायिनी कहा गया है। इनकी कृपा से भक्त के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, जीवन के कल्मष धुल जाते हैं और अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
🙏माँ महागौरी की महत्ता
नवरात्रि के आठवें दिन माँ महागौरी की पूजा का विशेष महत्व है।
इनकी उपासना से राहु ग्रह के दोष समाप्त होते हैं।
भक्त को शांति, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
🕉️ माँ महागौरी का मंत्र
➡️ "ॐ देवी महागौर्यै नमः।"📜 मंत्र का अर्थ:
हे महागौरी देवी! आपको नमन है। आप श्वेतवस्त्रधारिणी, शांति स्वरूपा और पवित्रता की प्रतिमूर्ति हैं। आपकी उपासना से भक्तों का जीवन निर्मल, पापमुक्त और कल्याणकारी हो जाता है।
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